बीता वर्ष बेहद याद आएगा
जितना हमें दे गया, उतना ही या शायद उससे कहीं ज़्यादा ले गया
कुछ यादें संग ले गया तो शायद उतनी ही दे भी गया
बीते वर्ष ने जितना विनम्र होना सिखाया, उतना ही मन को मज़बूत करना भी सिखाया
पर इस बार ये जाते-जाते छीन ले गया उसे , जिसने हमें दिया जीवन
ये तन-मन
वो जीवन भर पढ़ाती रही विनम्रता का पाठ
और जाते-जाते हम सभी को सिखा गई मन कड़ा करना
जय हो अम्मा
Thursday, December 31, 2009
लो फिर आ गया नया साल
नववर्ष 2010
लो फिर आ गया नया साल
लेकर सपनों का जंजाल
कुछ सच्चे-कुछ झूठे, कुछ पक्के-कुछ कच्चे, कुछ रूठे-कुछ अपने
तो आइए नए साल के बहाने
देखें कुछ सपने हम और आप
कम होगा जगती का ताप, भूख, बीमारी और अभाव
मानव का दुख और संताप, मिटेगा, है अगर कुछ पाप
सपने तो सपने हैं
भला सपनों से क्या मलाल
पूरे हों या रहें अधूरे
इनके सहारे कट तो जाएगा
एक और नया साल।।
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Sunday, August 30, 2009
बैलेट से एक और सत्ता पलट
जय जनता जापान की।
Tuesday, May 19, 2009
मीडिया का राहुल राग
अगर भारत के पत्र-पत्रिकाओं और विशेषकर समाचार चैनलों पर नज़र डालें तो लगता है कि देश की सारी समस्याओं की एक ही जड़ है वंशवाद। अगर हम उस समस्या से मुक्ति पा जाएँ तो गरीबी, भ्रष्टाचार, बीमारी, लाचारी, काहिली और जहालत सबसे छुटकारा हो जाएगा। ऐसा मैं नहीं कह रहा हूँ- मीडिया की चर्चाएँ सुनने से ऐसा निष्कर्ष निकलता है।
आप पूछेंगे कि क्यों और कैसे? तो गौर से पढ़िए-
लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान और उसके बाद भी सबसे अधिक चर्चा यही रही न कितने बेटों, भतीजों, चाचा-मामा, बीवी,बेटियों और बहुओं को टिकट मिले। और सबसे अधिक फ़ुटेज खाई मीडिया के युवराज राहुल गाँधी ने। मीडिया के इसलिए क्योंकि यह शब्द उसी ने जोड़ा है इस नाम के साथ।
आरोप यह था कि काँग्रेस पार्टी के नेता और सदस्य राहुल के सामने साष्टाँग दंडवत करते हैं, उनका शब्द ब्रहम है वगैरह-वगैरह। अब एक चैनल के महालंगर ( एंकर की हिंदी शब्दकोश में लंगर ही तो है) के लिए तो राहुल के नाम के साथ जी लगाना भी चाटुकारिता की पराकष्ठा था। मतलब वो अपनी अंग्रेज़ी में मिस्टर लगाएँ या बाप-दादा की उम्र के मेहमानों का नाम लें तो शालीनता और शिष्टाचार लेकिन कोई हिंदी में जी लगाए तो चाटुकार। धन्य हैं आप।
राहुल की प्रेस कान्फ़्रेंस में जिस तरह जी-जी- या मिस्टर गाँधी की पुकार लग रही थी और उनकी एक नज़र पाने के लिए घमासान था या पूरे चुनाव में और उसके बाद भी जिस तरह राहुल नाम की माला जपी जा रही है उससे तो यही लगता है कि राहुल राग जनता और नेताओं से अधिक मीडिया के सिर चढ़ कर बोल रहा है।
अगर मीडिया वास्तव में वंशवाद को देश के लिए अभिशाप मानता है तो क्यों मुम्बई या राजस्थान के चुनाव में सिर्फ़ सिर्फ़ एक शहज़ादे की हार-जीत पर चर्चा होती रही। अगर मैं गलत हूँ तो हमारे तमामा महालंगर अपने आर्काइव टोटलकर बताएँ कि दो दिन में कितनी बार बताया कि मुम्बई कि बाकी सीटों पर कौन जीता- कौन हारा। पीलीभीत से उम्मीदवार शहज़ादे और उनकी अम्मा की जीत का समाचार तो कैमरे पर ही उनके फ़ोन से मिली सूचना के आधार पर दिया गया। शायद यह बताना भी तो ज़रूरी है कि वो शहज़ादे सीधे महाएंकर को फ़ोन करते हैं। अगर राहुल , प्रियंका, मिलिंद, जतिन, सचिन , अखिलेश या उमर महज़ खानदानी नाम भुना रहे हैं तो लोकतंत्र के चौथे पाए के ये स्वनामधन्य पहरेदार क्यों उनकी गलबहियाँ के लिए आतुर रहते हैं, क्यों उनके मुँह से यह सुनकर छुईमुई हो जाते हैं कि आपको तो मैं जानता हूँ, या क्यों झाड़ तले दुबक कर मीठी-मीठी बतिया करते हैं। क्यों नहीं उन सबको इनके हाल पर छोड़ दिया जाता। क्यों पाठकों और दर्शकों को चौबीस घंटे इनके नाम की माला जपाई जाती है।
क्या देश में मुद्दों और हस्तियों की कमी हो गई है। नहीं असल बात कुछ और है। मीडिया के दूसरे फ़ितूरों की तरह यह भी बेमानी फ़ितूर है, बल्कि खुद को इन राजवंशों की नज़रों मंे चढ़ाने की कवायद है। ज़िला परिषद से लेकर राज्य सभा तक की सदस्यता, सरकार की लाखों सलाहकार समितियों की सदस्यता, भारत-भारती से लेकर पद्म पुरस्कार तक का मोह भला किसे नहीं होता।
अरे भइया जिस देश में लाला का बेटा लाला, किसान का बेटा किसान, डाक्टर का बेटा किसान, फ़ौजी का बेटा फ़ौजी, आईएएस का बेटा आईएएस, पत्रकार का बेटा पत्रकार बनना महज़ परम्परा नहीं संस्कार हो वहाँ राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा तो क्या प्रहलाद बनेगा।
अब आप कहेंगे कि प्रजातंत्र में राजा कहाँ है, तो भइया रजवाड़े भले ही खत्म हो गए हों पर न समाज की सामंती सोच बदली है न हमारी-आपकी। और वैसे भी जब राजनीति फ़ुलटाइम पेशा बन गई हो बेटे-बेटी-बहुएँ भला और कहाँ दुकान लगाएँगे।
सच यह है कि हमारा मीडिया भी जो दिखता है वो बिकता है की मानसिकता से ग्रस्त और त्रस्त है। अगर हम अकल के ठेकेदार वाकई देश को वंशवाद की विषबेल से छुटकारा दिलाना चाहते हैं तो अच्छा यही होगा कि इन वारिसों को इनके हाल पर छोड़ दे और इनके नाम की माला जपने की बजाय कि इस चुनाव में कितने उम्मीदवार ऐसे चुने गए जिन पर कोई मुकदमा नहीं है, सांसदों से पूछे कि अपने इलाके के लिए उनका ब्लू प्रिंट क्या है।
अगर पाँच साल तक पाँच सौ तैंतालीस सांसदों की सालाना रिपोर्ट ली जाए तो चैनलों को गड्ढों में कैमरे लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। यकीन मानिए वो भी बिकेगा क्योंकि इस नंगे-भूखे देश को दूसरों को नंगा करने से अधिक मज़ा किसी खेल में नहीं आता।
Monday, May 26, 2008
रिश्ते
यूँ तो अब अपने देश में भी हिंदी में पढने लायक सामग्री मिलना दुर्लभ होता जा रहा है लेकिन परदेस में यह कमी कुछ ज्यादा ही खलती है। भला हो इस इंटरनेट नामी अविष्कार और इस पर उपलब्ध ईपेपर, ब्लाग्स और अनगिनत हिंदी वेबसाइट्स का जो इस प्यास को बुझाने के बजाय बढ़ाते जा रहे हैं, मतलब आग में घी डालने का काम कर रहे हैं।
ऐसे ही किसी इंटरनेटी औज़ार की मदद से कोई दो महीने पहले कुछ पंक्तियाँ पढ़ने का संयोग हुआ तो ठगा सा रह गया। क्यों-कैसे यह जानने से पहले आप भी इनका पारायण कर लें।
कभी बड़ा सा हाथ खर्च थे, कभी हथेली की सूजन
मेरे मन का आधा साहस , आधा डर थे बाबूजी।
60 से 80 –90 के दशक तक बड़ी हुई पीढ़ी के मेरे जैसे जीवों के लिए आलोक श्रीवास्तव(शायद यही नाम है लेखक का) की ये पंक्तियां जीवन का सार हैं। आज भी आम शहरों और कस्बों के नौजवान हथेली की सूजन और बाबूजी का रिश्ता समझते हैं। इस युग में बाबूजी जब डैड होते जा रहे हैं तब साहस और डर की इस गुत्थी को समझना और भी ज़रूरी हो जाता है। आगे की पंक्तियों में कवि ने अम्माऔर बाबूजी के रिश्ते की कड़वी पर सटीक तस्वीर खींची है।
अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है
अम्मा जी की सारी सजधज, सब ज़ेवर थे बाबूजी।
घर में अम्मा की अहमियत और बाबूजी के ना रहने पर उनकी गति का ऐसा भुक्तभोगी वर्णन भी मैंने कहीं और नहीं पढ़ा है।
घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे,
चुपके-चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा।
बाबूजी गुज़रे घर में सारी सोचें तकसीम हुईं,
मैं सबसे छोटा था मेरे हिस्से आई अम्मा।
पता नहीं आपको इन पंक्तियों ने कितना छुआ पर मुझे तो लगा कि नंगा तार छू लिया हो जैसे।
ऐसे ही किसी इंटरनेटी औज़ार की मदद से कोई दो महीने पहले कुछ पंक्तियाँ पढ़ने का संयोग हुआ तो ठगा सा रह गया। क्यों-कैसे यह जानने से पहले आप भी इनका पारायण कर लें।
कभी बड़ा सा हाथ खर्च थे, कभी हथेली की सूजन
मेरे मन का आधा साहस , आधा डर थे बाबूजी।
60 से 80 –90 के दशक तक बड़ी हुई पीढ़ी के मेरे जैसे जीवों के लिए आलोक श्रीवास्तव(शायद यही नाम है लेखक का) की ये पंक्तियां जीवन का सार हैं। आज भी आम शहरों और कस्बों के नौजवान हथेली की सूजन और बाबूजी का रिश्ता समझते हैं। इस युग में बाबूजी जब डैड होते जा रहे हैं तब साहस और डर की इस गुत्थी को समझना और भी ज़रूरी हो जाता है। आगे की पंक्तियों में कवि ने अम्माऔर बाबूजी के रिश्ते की कड़वी पर सटीक तस्वीर खींची है।
अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है
अम्मा जी की सारी सजधज, सब ज़ेवर थे बाबूजी।
घर में अम्मा की अहमियत और बाबूजी के ना रहने पर उनकी गति का ऐसा भुक्तभोगी वर्णन भी मैंने कहीं और नहीं पढ़ा है।
घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे,
चुपके-चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा।
बाबूजी गुज़रे घर में सारी सोचें तकसीम हुईं,
मैं सबसे छोटा था मेरे हिस्से आई अम्मा।
पता नहीं आपको इन पंक्तियों ने कितना छुआ पर मुझे तो लगा कि नंगा तार छू लिया हो जैसे।
Saturday, May 3, 2008
अनुशासन
अनुशासन भी बड़ी दिलचस्प चीज़ है। जापान की नफ़ासत, अनुशासन और तमीज़ का डंका सारी दुनिया में बजता है। स्वागत में झुक-झुक कर दोहरे होते, घर आए मेहमान के जूते पलट कर रखते जापानी, घंटो शंात क़तार में खड़े अपनी बारी आने का इंतज़ार करते जापानी, जापान की पहचान हैं। पर ऐसा अनुशासन भी किस काम का कि पेड़ झूम के मनमाना न फैल सके, कुत्ते का जब मन करे न भौंक सके। पेड़ बड़ा हो या छोटा उसे काट-छाँट कर कतर-ब्योंत कर ऐसे तराश देंगे कि देखना वाला कहे भई वाह! पर ज़रा पेड़ से भी तो पूछो कि भाई तुझे किधर जाना था । वैसे तो बच्चो को भी छूने से पहले पूछेंगे दाई जोबू यानि ठीक है न, और बेचारे पेड़ का कोई ह्यूमन राइट नहीं है। झट कैंची उठाई और कतर दिए उसके पर । मियाँ किधर चले, अपनी औक़ात में रहो। इधर-उधर पर मत फैलाओ। घर के आँगन में तुम्हें खड़ा तो होना है पर, हम जिधर-जितनी चाहेंगे उतनी ही शाखें फैलाने की इजाज़त है। आफ भले ही इसे अनुशासन और वृक्ष सौंदर्य कहें मैं तो इसे ग़ुलामी कहता हूँ। बन्दों पर बस नहीं चला तो पेड़ पौधों की लगाम कस दी। वो ठहरे बेचारे निरीह प्राणी। वैसे हम भारत वालों को परदेस में आकर अपने देश की जो सबसे पहली कमी खटकती है वो है पंक्चुएलिटि और डिसिप्लिन की कमी । जहाँ दो-चार भारतीय जमा हुए लगे बतियाने और धीरे- धीरे गरियाने कि देखो इस देश में सब कुछ कितना समय पर चलता है। हर काम में अनुशासन है। रेल हो, बस या टैक्सी हर जगह हर कोई कतार में खड़ा दिखाई देता है। पता नहीं ये इंडिया वाले कब सीखेंगे यह सब। ( जी हाँ ये भी खूबी है कि भारत से बाहर निकले नहीं कि वो भारत से इंडिया हो जाता है और हम इंडियन) जुम्मा-जुम्मा दो चार महीने ही बीते होंगे और परदेसी इंडियन खुद को उस इंडिया से बड़ी सफ़ाई से अलग कर लेते हैं जहाँ के लोग हिंदी बोलते हैं, टाट पट्टी पर बैठकर पढ़ते हैं और यह नहीं जानते कि वक्त की पाबंदी और अनुशासन किस चिड़िया के नाम हैं। असल में हम बड़ी आसानी से यह भूल जाते हैं कि कल तक हम भी उन्हीं इंडियंस में शुमार थे जिनके लिए आईएसटी का मतलब इंडियन स्टैंडर्ड टाइम है, जो कालेज से दफ़्तर तक हर जगह देर से पहुँचना, पिच्च से सड़क चलते थूकना, रेल, बस में धक्का-मुक्की करना और राह चलते फ़ूल तोड़ना और अगर कुछ बस न चले तो ठोकर मारते चलना अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझते हैं। परदेस में आकर जब विदेशी हमें मेहनती और अकलमंद कहते हैं तो खुशी में फूले नहीं समाते । वो तो हमारी निजी उपलब्धि होती है, उसमें अपने देश के पालन-पोषण का, गाँव-कस्बे के स्कूल और मास्टर जी का, उस पढ़ाई का कोई अंश नहीं होता जिसने हमें इस लायक़ बनाया कि परदेस में सिर उठाकर जी सकें। मेरी मोटी बुद्धि में यह बात नहीं समाती कि कौन से स्कूल में, कौन से मास्टर जी ने हमें यह सिखाया कि बेटा काम वक्त से मत करना, स्कूल देर से आना? ज़रा सा अपना गिरेबान में झाँक कर देखें तो समझ आएगा कि भारत को इनडिसिप्लिन्ड, नानसेन्स,डर्टी बनाने वाले भी हम ही हैं और परदेस में वक्त की पाबंदी और हर माहौल में ढल जाने की अपनी काबलियत का लोहा मनवाने वाले भी हम ही हैं। फ़र्क है तो सिर्फ़ सोच का।
Friday, April 18, 2008
हात्सुमोदे
असल में जापान आते ही नया वर्ष शुरु होने पर हात्सुमोदे यानी प्रथम दर्शन करने का अवसर मिला तो मुँहमाँगी मुराद पूरी होती लगी। इसके एक नहीं दो कारण थे । एक तो आस्तिक मन नए वर्ष में देव दर्शन की कल्पना मात्र से ही प्रफुल्लित हो उठा, दूसरे मन यह देखने को भी आतुर था कि आखिर यह प्रथम दर्शन है क्या? राजधानी तोक्यो से लगभग पचास किलोमीटर दक्षिण-दक्षिन पश्चिम में कानागावा प्रीफ़ैक्चर यानी कानागावा प्रांत में एक प्राचीन नगर है-कामाकुरा। तीन तरफ़ से पहाड़ों और एक तरफ़ से सागामि खाड़ी के निर्मल जल की प्राकृतिक पहरेदारी में संरक्षित कामाकुरा का जापान के इतिहास में एक बड़ा मुकाम है। कहते हैं, सन् १२५० में यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा नगर हुआ करता था। १२ वीं से १४ वीं शताब्दी तक यह नगर मिनामोतो शोगुन राजवंश का गढ़ और जापान की राजधानी रहा। इसी मिनामोतो राजवंश के संस्थापक शोगुन मिनामोतो योरितोगो ने अपने शासन के संरक्षण और सुख समृद्धि की कामना में यहाँ एक भव्य मंदिर बनवाया जिसे जापान की शिन्तो धार्मिक आस्था के अनुसार श्राइन कहा जाता है। शिन्तो परम्परा में कोई प्रतिमा नहीं होती। एक तरह से कह सकते हैं कि अमूर्त ईश्वर या सृष्टि ही आराध्य है। तो हमें भी देवदर्शन के लिए कामाकुरा के इसी सुप्रसिद्ध त्सुरुगाओका हाचिमान श्राइन में जाने का सौभाग्य मिला।
सुबह सवेरे शुद्ध तन-मन से साथियों के संग कामाकुरा स्टेशन पर उतरे। बाहर निकलते ही काफ़ी शाप और आसमान छूती इमारतों की तमाम आधुनिकता के बीच हवा में श्रद्धा की खुनकी थी। श्राइन तक पहुँचने का संकरा लेकिन बुहारा हुआ रास्ता, जापानी पारम्परिक हस्तशिल्प और भक्तजनों को लुभाने लायक सामान और खाने-पीने की चीज़ों की छोटी-छोटी दुकानों के एक-एक करते खुलते द्वार हरिद्वार से प्रयाग और वृंदावन से द्वारिका तक सभी तीर्थ नगरियों की याद ताज़ा करा गए। निर्मल सर्द हवा में अपनेपन की गंध टटोलते श्राइन के मुख्य द्वार तक कब पहुँच गए पता ही नहीं चला।
हस्तप्रक्षालन और आचमन के लिए जल कुंड में आता निर्मल जल, जगह-जगह टंगी मन्नत की तख्तियाँ और भाग्य बताती पर्चियाँ, एक पूजास्थल के द्वार पर एक कन्या को मनोकामनापूर्ति का आशीर्वाद देते धवल वस्त्रधारी पुजारी-पुजारिन, विशेष पूजा के लिए पर्चियों पर आवेदन करते भक्तजन देखकर लगा ही नहीं कि ये किसी दूसरे देश का पूजास्थल है। इतना ही नहीं पूजा प्रार्थना के बाद घर ले जाने के लिए वर्ष भर स्वास्थ्य, विद्या, कारोबार और यहाँ तक की सुरक्षित ड्राइविंग का भरोसा दिलाते टोटकों के साथ भविष्य बताने वाली पर्चियो की दुकानें और पेट पूजा के लिए रसीले जापानी व्यँजनों की महक से सराबोर खोमचे गंगा दशहरा से लेकर जन्माष्टमी और विजयदशमी जैसे तमाम मेलों की याद दिला गए।
आश्चर्य तब हुआ जब श्राइन के प्राँगण से सड़क पार मीलों दूर तक फैलती लाइन के बावजूद कहीं कोई आतुरता, कोई भगदड़, कोई हड़बड़ी नहीं दिखी। मेले की लकदक रौनक तो थी पर झूठे पत्तलों के ढेर और उन पर भिनभिनभिनाते मक्खियों के झुंड, झूठन पर लड़ते कुत्ते एवम् दूर तक पीछा करते भिखारी नदारद थे। तब अहसास हुआ कि यह जापान है अपना भारत महान नहीं।
हस्तप्रक्षालन और आचमन के लिए जल कुंड में आता निर्मल जल, जगह-जगह टंगी मन्नत की तख्तियाँ और भाग्य बताती पर्चियाँ, एक पूजास्थल के द्वार पर एक कन्या को मनोकामनापूर्ति का आशीर्वाद देते धवल वस्त्रधारी पुजारी-पुजारिन, विशेष पूजा के लिए पर्चियों पर आवेदन करते भक्तजन देखकर लगा ही नहीं कि ये किसी दूसरे देश का पूजास्थल है। इतना ही नहीं पूजा प्रार्थना के बाद घर ले जाने के लिए वर्ष भर स्वास्थ्य, विद्या, कारोबार और यहाँ तक की सुरक्षित ड्राइविंग का भरोसा दिलाते टोटकों के साथ भविष्य बताने वाली पर्चियो की दुकानें और पेट पूजा के लिए रसीले जापानी व्यँजनों की महक से सराबोर खोमचे गंगा दशहरा से लेकर जन्माष्टमी और विजयदशमी जैसे तमाम मेलों की याद दिला गए।
आश्चर्य तब हुआ जब श्राइन के प्राँगण से सड़क पार मीलों दूर तक फैलती लाइन के बावजूद कहीं कोई आतुरता, कोई भगदड़, कोई हड़बड़ी नहीं दिखी। मेले की लकदक रौनक तो थी पर झूठे पत्तलों के ढेर और उन पर भिनभिनभिनाते मक्खियों के झुंड, झूठन पर लड़ते कुत्ते एवम् दूर तक पीछा करते भिखारी नदारद थे। तब अहसास हुआ कि यह जापान है अपना भारत महान नहीं।
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