Saturday, February 6, 2010

अमिताभ और मीडिया का रण

            रण में हैं अमिताभ। जी हाँ आप सही समझे रण फ़िल्म की रिलीज़ के साथ ही अमिताभ और उस मीडिया के बीच रण छिड़ गया है जिसने उन्हें महानायक जैसी पदवियों से महिमामंडित किया है।
          यहाँ एक बात साफ़ कर देना ज़रूरी है कि निजी तौर पर मैं अमिताभ बच्चन की अदाकारी का प्रशंसक हूँ लेकिन व्यक्तिगत परिचय न होने के कारण व्यक्ति अमिताभ’ पर कोई टिप्पणी करने का अधिकार मुझे नहीं है।  मुझे लगता है कि अमिताभ बच्चन हम आप जैसे ही एक आम इंसान हैं जिन्होंने हिंदी के एक नामी कवि के घर जन्म लिया और लाखों भारतीय नौजवानों की तरह फ़िल्म जगत का आकर्षण उन्हें मुम्बई ले गया। तमाम अभिनेताओं और कलाकारों की तरह अपने हिस्से का रण हारते-जीतते अभिनेता अमिताभ नाम और पैसा भी कमाते गए।
          हमारी-आपकी तरह उन्होंने भी अपने दोस्त चुने और अपने ढंग से उनका साथ निभाया। पैसा कमाने के लिए जो काम आता रहा करते गए।
          काँग्रेस की सांसदी हो या अमर-मुलायम मित्रता या ठाकरे संधि या फिर ताज़ा मोदी प्रकरण क्या हम यह नहीं मान सकते कि हमारी आपकी तरह अमिताभ बच्चन नाम के एक व्यक्ति ने अपने विवेक के आधार पर समय और काल में जो सही समझा किया।
          हमारे कुछ मित्रों को यह समस्या का सरलीकरण दिखेगा।
          प्रश्न यह है कि अमिताभ बच्चन ने किससे कहा था कि भईया हमें महानायक कहो। यह सारा जंजाल मीडिया का रचा था। जब वे मीडिया से नहीं मिलते थे तो शिकायत थे बहुत अकड़ू खाँ हैं।
          समझना यह होगा कि अमिताभ बच्चन हों या शाहरूख खान या आमिर खान ये सब तमाम अखबारों और टेलीविज़न चैनलों की तरह ही बाज़ार में खड़े कारोबार कर रहे हैं।
          अमिताभ बच्चन ने नरेन्द्र मोदी को ‘पा’ दिखाई तो साम्प्रदायिक हो गए, शाहरूख या आमिर ने जब आडवाणी जी या शीला जी के लिए अपनी फ़िल्मों के विशेष शो किए तो वे महान हो गए। अमिताभ बच्चन ने ठाकरे त्रयी से माफ़ी माँग ली या उन्हें बुज़ुर्ग कह दिया तो वे रीढ़विहीन हो गए, करन जौहर ने जब राज ठाकरे के घर जाकर माफ़ी माँगी थी तो अपना कारोबार बचाया था।
          हम और आप जब बच्चों को सिखाते हैं कि बेटा फ़लाँ से पंगा मत लेना या मौहल्ले के दादा की गली से दुबक कर गुज़रते हैं और उसका प्यादा भी सामने पड़ जाए तो खिसियाते हुए नमस्ते भाई जी कहते है, अथवा  स्कूल के दाखिले से लेकर रेल टिकट तक की लाइन से बचने के लिए अपने पत्रकार होने की धौंस दिखाते हैं या फ़िर दलाल को भईया पुकारते हैं तब हम निरीह होते हैं।
          मुझे लगता है कि मामला कुछ और है। रण फ़िल्म ने जिस तरह से मीडिया को स्टिंग  यानि दंश दिया है उसका घाव बहुत गहरा है।
          भईया अमिताभ ने यूपी में जुर्म कम होने का प्रचार करने वाले विज्ञापन किए तो उन्हें जनता को दिखाया किसने? दूरदर्शन को छोड़कर ऐसा कौन सा चैनल है जिसने उसे दिखाकर कमाई करने से इंकार किया । है कोई माई का लाल।
          अमिताभ तेल से लेकर चाकलेट तक सब बेचते दिखाई देते हैं पर दिखाता कौन है, छोटे बड़े हर टाक शो में अमरसिंह को बुलाता कौन है? अभी तक अमिताभ बच्चन या अमर सिंह ने तो कोई चैनल खोला नहीं है? क्या यह सच नहीं है कि किसी भी चैनल में नौकरी पाने की एक शर्त यह भी है कितने बड़े नेताओं या धन्ना सेठों के फ़ोन नम्बर आपके मोबाइल में हैं।
          लोग कहते हैं कि अमिताभ पैसे के लिए कुछ भी कर सकते हैं । कल को सिगरेट का विज्ञापन भी कर लेंगे तो भईया अगर सरकार अनुमति दे दे तो क्या अखबार या चैनल वाले शराब और सिगरेट के विज्ञापन दिखाने से मना कर देंगे। क्या रेड एंड व्हाईट पीने वालों की बात ही कुछ और है जैसे विज्ञापन छापे नहीं जाते रहे हैं। क्या बैगपाइपर, किंगफ़िशर और रायल  स्टैग जैसे सुरा ब्राँड के छद्म विज्ञापनों से किसी चैनल को परहेज़  है। कौन मजबूर करता है आपको यह सब दिखाने के लिए अगर यह समाज के हित में नहीं है।
          सामना का सामाना रोज़ाना कितने पाठकों से होता है। उसमें किस ने कैसा ज़हर उगला है यह बता कर सामना का प्रचार कौन करता है शिवसेना या मीडिया।
          ये कैसी नैतिकता है कि हम कमाई के लिए चाहें जिस को स्टिंग कर दें। सच को जाने बिना बाप को बेटी का कातिल घोषित कर  सजा तजवीज़ कर दें। लोगों के घर और ज़िंदगी में ज़बर्दस्ती घुसे चलें जाएँ। वरिष्ठ पत्रकार के नाम सैंकड़ों सरकारी कमेटियों में शामिल हो उसी सरकार की मेहमाननवाज़ी का लुत्फ़ उठाएँ जिसे सुबह शाम गलियाएँ। सरकारी खर्चे पर कवरेज के लिए जाएँ।
          लेकिन अगर अमिताभ बच्चन या शिवसेना या अमर सिंह  अपना कारोबार या नाम चमकाने के लिए जो सही समझें करे तो महानालायक कहलाएँ। वाह री नैतिकता!
           लेकिन जो मीडिया बाप के मरने पर बेटे से पूछता है- ‘आपको कैसा लग रहा है’ या स्टूडियो में बैठे नामी एंकर मुर्दनी के मौके पर मौजूद दूसरे नामी पत्रकार से पूछते है ‘वहाँ का माहौल कैसा है’, उससे और क्या उम्मीद की जा सकती है।
          इस देश में मुद्दों और समस्याओं की कमी नहीं है पर उन्हें देखने-समझने की न किसी को फ़ुर्सत है, न समझ ।
          असल में हम भारतीयों या यूँ कहूँ कि इंसानों की फ़ितरत है कि पहले इंसान को देवता बनाते हैं, महिमामंडित करते हैं, मूर्तियाँ गढ़ते हैं फिर उन्हीं को तोड़ते हैं।
          ज़रुरत अमिताभ बच्चन या शिवसेना या भाजपा या मोदी को गलियाने की नहीं है। ज़रूरत इस बात की है कि वो जो कुछ कर रहें अगर हमें गलत लगता है तो उसका प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रचार न करें। यूपी का जुर्म हो या गुजरात का पर्यटन कोई अमिताभ , कोई मोदी, कोई अमर सिंह इस देश की जनता को मुलायम नहीं कर सकता।  ये पब्लिक है सब जानती है।
          रण एक फ़िल्म है जिसमें फ़िल्मकार ने कुछ मुद्दे उछाले हैं, उनसे तिलमिलाने के बजाय उन का मंथन करने से गरल के साथ अमृत भी निकलेगा। व्यर्थ खम्भे नोचने से कुछ नहीं होगा।
          अमिताभ तेल बेचें या गुजरात, ये उनका धंधा है। अपुन को उनकी अदाकारी पसंद है सो पसंद है। अमिताभ ने समाज को विचार या दिशा देने का ठेका लेने का टेंडर कब भरा ?       

Thursday, December 31, 2009

बीता वर्ष


बीता वर्ष बेहद याद आएगा
जितना हमें दे गया, उतना ही या शायद उससे कहीं ज़्यादा ले गया
कुछ यादें संग ले गया तो शायद उतनी ही दे भी गया
बीते वर्ष ने जितना विनम्र होना सिखाया, उतना ही मन को मज़बूत करना भी सिखाया
पर इस बार ये जाते-जाते छीन ले गया उसे , जिसने हमें दिया जीवन
ये तन-मन
वो  जीवन भर पढ़ाती रही विनम्रता का पाठ
और जाते-जाते हम सभी को सिखा गई मन कड़ा करना
जय हो अम्मा






लो फिर आ गया नया साल

नववर्ष 2010
लो फिर आ गया नया साल
लेकर सपनों का जंजाल
कुछ सच्चे-कुछ झूठे,  कुछ पक्के-कुछ कच्चे,  कुछ रूठे-कुछ अपने
तो आइए नए साल के बहाने
देखें कुछ सपने हम और आप
कम होगा जगती का ताप, भूख, बीमारी और अभाव
मानव का दुख और संताप,  मिटेगा, है अगर कुछ पाप
सपने तो सपने हैं
भला सपनों से क्या मलाल
पूरे हों या  रहें अधूरे
इनके सहारे कट तो जाएगा
एक और नया साल।।
-      

Sunday, August 30, 2009

बैलेट से एक और सत्ता पलट


जापान में तूफ़ान और ज़लज़ले के साथ शुरू हुई ३१ अगस्त की तारीख राजनीति में भूकम्प लेकर आई। खत्म हुआ एलडीपी का सुनहरा राज और दूसरे महायुद्ध के बाद पहली बार पलट गई सत्ता। जनता ने निकम्मी, नाकारा, ढुलमुल और कमज़ोर के विशेषणों से अलंकृत डैमोक्रेटिक पार्टी को सौंप दी सत्ता की बागडोर। जीत के जश्न में न ढोल बजे न नगाड़े, मालाओं का ढेर भी नदारद था। विजेता दल के नेता और भावी प्रधानमंत्री युकिओ हातोयामा बस एक बार मुस्कुराए। जापान का ट्रेडमार्क विक्टरी साइन भी लापता दिखा। असल में उनके सिर पर भी सुपर बास ओज़ावा की तलवार है , जाने उन्हें गद्दी मिलेगी या ओज़ावा खुद विराजमान हो जाएँगे दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति के सिंहासन पर।
जय जनता जापान की।

Tuesday, May 19, 2009

मीडिया का राहुल राग


अगर भारत के पत्र-पत्रिकाओं और विशेषकर समाचार चैनलों पर नज़र डालें तो लगता है कि देश की सारी समस्याओं की एक ही जड़ है वंशवाद। अगर हम उस समस्या से मुक्ति पा जाएँ तो गरीबी, भ्रष्टाचार, बीमारी, लाचारी, काहिली और जहालत सबसे छुटकारा हो जाएगा। ऐसा मैं नहीं कह रहा हूँ- मीडिया की चर्चाएँ सुनने से ऐसा निष्कर्ष निकलता है।
आप पूछेंगे कि क्यों और कैसे? तो गौर से पढ़िए- 
लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान और उसके बाद भी सबसे अधिक चर्चा यही रही न कितने बेटों, भतीजों, चाचा-मामा, बीवी,बेटियों और बहुओं को टिकट मिले। और सबसे अधिक फ़ुटेज खाई मीडिया के युवराज राहुल गाँधी ने। मीडिया के इसलिए क्योंकि यह शब्द उसी ने जोड़ा है इस नाम के साथ। 
आरोप यह था कि काँग्रेस पार्टी के नेता और सदस्य राहुल के सामने साष्टाँग दंडवत करते हैं, उनका शब्द ब्रहम है वगैरह-वगैरह। अब एक चैनल के महालंगर ( एंकर की हिंदी शब्दकोश में लंगर ही तो है) के लिए तो राहुल के नाम के साथ जी लगाना भी चाटुकारिता की पराकष्ठा था। मतलब वो अपनी अंग्रेज़ी में मिस्टर लगाएँ या बाप-दादा की उम्र के मेहमानों का नाम लें तो शालीनता और शिष्टाचार लेकिन कोई हिंदी में जी लगाए तो चाटुकार। धन्य हैं आप।
राहुल की प्रेस कान्फ़्रेंस में जिस तरह जी-जी- या मिस्टर गाँधी की पुकार लग रही थी और उनकी एक नज़र पाने के लिए घमासान था या पूरे चुनाव में और उसके बाद भी जिस तरह राहुल नाम की माला जपी जा रही है उससे तो यही लगता है कि राहुल राग जनता और नेताओं से अधिक मीडिया के सिर चढ़ कर बोल रहा है।
अगर मीडिया वास्तव में वंशवाद को देश के लिए अभिशाप मानता है तो क्यों मुम्बई या राजस्थान के चुनाव में सिर्फ़ सिर्फ़ एक शहज़ादे की हार-जीत पर चर्चा होती रही। अगर मैं गलत हूँ तो हमारे तमामा महालंगर अपने आर्काइव टोटलकर बताएँ कि दो दिन में कितनी बार बताया कि मुम्बई कि बाकी सीटों पर कौन जीता- कौन हारा। पीलीभीत से उम्मीदवार शहज़ादे और उनकी अम्मा की जीत का समाचार तो कैमरे पर ही उनके फ़ोन से मिली सूचना के आधार पर दिया गया। शायद यह बताना भी तो ज़रूरी है कि वो शहज़ादे सीधे महाएंकर को फ़ोन करते हैं। अगर राहुल , प्रियंका, मिलिंद, जतिन, सचिन , अखिलेश या उमर  महज़ खानदानी नाम भुना रहे हैं तो लोकतंत्र के चौथे पाए के ये स्वनामधन्य पहरेदार क्यों उनकी गलबहियाँ के लिए आतुर रहते हैं, क्यों उनके मुँह से यह सुनकर छुईमुई हो जाते हैं कि आपको तो मैं जानता हूँ, या क्यों झाड़ तले दुबक कर मीठी-मीठी बतिया करते हैं। क्यों नहीं उन सबको इनके हाल पर छोड़ दिया जाता। क्यों पाठकों और दर्शकों को चौबीस घंटे इनके नाम की माला जपाई जाती है। 
क्या देश में मुद्दों और हस्तियों की कमी हो गई है। नहीं असल बात कुछ और है। मीडिया के दूसरे फ़ितूरों की तरह यह भी बेमानी फ़ितूर है, बल्कि खुद को इन राजवंशों की नज़रों मंे चढ़ाने की कवायद है। ज़िला परिषद से लेकर राज्य सभा तक की सदस्यता, सरकार की लाखों सलाहकार समितियों की सदस्यता, भारत-भारती से लेकर पद्म पुरस्कार तक का मोह भला किसे नहीं होता। 
अरे भइया जिस देश में लाला का बेटा लाला, किसान का बेटा किसान, डाक्टर का बेटा किसान, फ़ौजी का बेटा फ़ौजी, आईएएस का बेटा आईएएस, पत्रकार का बेटा पत्रकार बनना महज़ परम्परा नहीं संस्कार हो वहाँ राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा तो क्या प्रहलाद बनेगा। 
अब आप कहेंगे कि प्रजातंत्र में राजा कहाँ है, तो भइया रजवाड़े भले ही खत्म हो गए हों पर न समाज की सामंती सोच बदली है न हमारी-आपकी। और वैसे भी जब राजनीति फ़ुलटाइम पेशा बन गई हो बेटे-बेटी-बहुएँ भला और कहाँ दुकान लगाएँगे।
सच यह है कि हमारा मीडिया भी जो दिखता है वो बिकता है की मानसिकता से ग्रस्त और त्रस्त है। अगर हम अकल के ठेकेदार वाकई देश को वंशवाद की विषबेल से छुटकारा दिलाना चाहते हैं तो अच्छा यही होगा कि इन वारिसों को इनके हाल पर छोड़ दे और इनके नाम की माला जपने की बजाय कि इस चुनाव में कितने उम्मीदवार ऐसे चुने गए जिन पर कोई मुकदमा नहीं है, सांसदों से पूछे कि अपने इलाके के लिए उनका ब्लू प्रिंट क्या है।
अगर पाँच साल तक पाँच सौ तैंतालीस सांसदों की सालाना रिपोर्ट ली जाए तो चैनलों को गड्ढों में कैमरे लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। यकीन मानिए वो भी बिकेगा क्योंकि इस नंगे-भूखे देश को दूसरों को नंगा करने से अधिक मज़ा किसी खेल में नहीं आता।

Monday, May 26, 2008

रिश्ते

यूँ तो अब अपने देश में भी हिंदी में पढने लायक सामग्री मिलना दुर्लभ होता जा रहा है लेकिन परदेस में यह कमी कुछ ज्यादा ही खलती है। भला हो इस इंटरनेट नामी अविष्कार और इस पर उपलब्ध ईपेपर, ब्लाग्स और अनगिनत हिंदी वेबसाइट्स का जो इस प्यास को बुझाने के बजाय बढ़ाते जा रहे हैं, मतलब आग में घी डालने का काम कर रहे हैं।
ऐसे ही किसी इंटरनेटी औज़ार की मदद से कोई दो महीने पहले कुछ पंक्तियाँ पढ़ने का संयोग हुआ तो ठगा सा रह गया। क्यों-कैसे यह जानने से पहले आप भी इनका पारायण कर लें।
कभी बड़ा सा हाथ खर्च थे, कभी हथेली की सूजन
मेरे मन का आधा साहस , आधा डर थे बाबूजी।

60 से 80 –90 के दशक तक बड़ी हुई पीढ़ी के मेरे जैसे जीवों के लिए आलोक श्रीवास्तव(शायद यही नाम है लेखक का) की ये पंक्तियां जीवन का सार हैं। आज भी आम शहरों और कस्बों के नौजवान हथेली की सूजन और बाबूजी का रिश्ता समझते हैं। इस युग में बाबूजी जब डैड होते जा रहे हैं तब साहस और डर की इस गुत्थी को समझना और भी ज़रूरी हो जाता है। आगे की पंक्तियों में कवि ने अम्माऔर बाबूजी के रिश्ते की कड़वी पर सटीक तस्वीर खींची है।
अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है
अम्मा जी की सारी सजधज, सब ज़ेवर थे बाबूजी।

घर में अम्मा की अहमियत और बाबूजी के ना रहने पर उनकी गति का ऐसा भुक्तभोगी वर्णन भी मैंने कहीं और नहीं पढ़ा है।
घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे,
चुपके-चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा।
बाबूजी गुज़रे घर में सारी सोचें तकसीम हुईं,
मैं सबसे छोटा था मेरे हिस्से आई अम्मा।

पता नहीं आपको इन पंक्तियों ने कितना छुआ पर मुझे तो लगा कि नंगा तार छू लिया हो जैसे।

Saturday, May 3, 2008

अनुशासन

अनुशासन भी बड़ी दिलचस्प चीज़ है। जापान की नफ़ासत, अनुशासन और तमीज़ का डंका सारी दुनिया में बजता है। स्वागत में झुक-झुक कर दोहरे होते, घर आए मेहमान के जूते पलट कर रखते जापानी, घंटो शंात क़तार में खड़े अपनी बारी आने का इंतज़ार करते जापानी, जापान की पहचान हैं। पर ऐसा अनुशासन भी किस काम का कि पेड़ झूम के मनमाना न फैल सके, कुत्ते का जब मन करे न भौंक सके। पेड़ बड़ा हो या छोटा उसे काट-छाँट कर कतर-ब्योंत कर ऐसे तराश देंगे कि देखना वाला कहे भई वाह! पर ज़रा पेड़ से भी तो पूछो कि भाई तुझे किधर जाना था । वैसे तो बच्चो को भी छूने से पहले पूछेंगे दाई जोबू यानि ठीक है न, और बेचारे पेड़ का कोई ह्यूमन राइट नहीं है। झट कैंची उठाई और कतर दिए उसके पर । मियाँ किधर चले, अपनी औक़ात में रहो। इधर-उधर पर मत फैलाओ। घर के आँगन में तुम्हें खड़ा तो होना है पर, हम जिधर-जितनी चाहेंगे उतनी ही शाखें फैलाने की इजाज़त है। आफ भले ही इसे अनुशासन और वृक्ष सौंदर्य कहें मैं तो इसे ग़ुलामी कहता हूँ। बन्दों पर बस नहीं चला तो पेड़ पौधों की लगाम कस दी। वो ठहरे बेचारे निरीह प्राणी। वैसे हम भारत वालों को परदेस में आकर अपने देश की जो सबसे पहली कमी खटकती है वो है पंक्चुएलिटि और डिसिप्लिन की कमी । जहाँ दो-चार भारतीय जमा हुए लगे बतियाने और धीरे- धीरे गरियाने कि देखो इस देश में सब कुछ कितना समय पर चलता है। हर काम में अनुशासन है। रेल हो, बस या टैक्सी हर जगह हर कोई कतार में खड़ा दिखाई देता है। पता नहीं ये इंडिया वाले कब सीखेंगे यह सब। ( जी हाँ ये भी खूबी है कि भारत से बाहर निकले नहीं कि वो भारत से इंडिया हो जाता है और हम इंडियन) जुम्मा-जुम्मा दो चार महीने ही बीते होंगे और परदेसी इंडियन खुद को उस इंडिया से बड़ी सफ़ाई से अलग कर लेते हैं जहाँ के लोग हिंदी बोलते हैं, टाट पट्टी पर बैठकर पढ़ते हैं और यह नहीं जानते कि वक्त की पाबंदी और अनुशासन किस चिड़िया के नाम हैं। असल में हम बड़ी आसानी से यह भूल जाते हैं कि कल तक हम भी उन्हीं इंडियंस में शुमार थे जिनके लिए आईएसटी का मतलब इंडियन स्टैंडर्ड टाइम है, जो कालेज से दफ़्तर तक हर जगह देर से पहुँचना, पिच्च से सड़क चलते थूकना, रेल, बस में धक्का-मुक्की करना और राह चलते फ़ूल तोड़ना और अगर कुछ बस न चले तो ठोकर मारते चलना अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझते हैं। परदेस में आकर जब विदेशी हमें मेहनती और अकलमंद कहते हैं तो खुशी में फूले नहीं समाते । वो तो हमारी निजी उपलब्धि होती है, उसमें अपने देश के पालन-पोषण का, गाँव-कस्बे के स्कूल और मास्टर जी का, उस पढ़ाई का कोई अंश नहीं होता जिसने हमें इस लायक़ बनाया कि परदेस में सिर उठाकर जी सकें। मेरी मोटी बुद्धि में यह बात नहीं समाती कि कौन से स्कूल में, कौन से मास्टर जी ने हमें यह सिखाया कि बेटा काम वक्त से मत करना, स्कूल देर से आना? ज़रा सा अपना गिरेबान में झाँक कर देखें तो समझ आएगा कि भारत को इनडिसिप्लिन्ड, नानसेन्स,डर्टी बनाने वाले भी हम ही हैं और परदेस में वक्त की पाबंदी और हर माहौल में ढल जाने की अपनी काबलियत का लोहा मनवाने वाले भी हम ही हैं। फ़र्क है तो सिर्फ़ सोच का।